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वैदिक ज्योतिष में रोग का निर्धारण

वैदिक ज्योतिष में रोग का निर्धारण
उत्तम स्वास्थ्य के बिना कोई भी सुख वास्तव मैं सुख
नहीं है ,
इसीलिए हमारे पूर्वजों ने निरोगी काया को जीवन का पहला सुख माना ।
हमे कुंडली से भी जातक के स्वास्थ्य के विषय में बहुत जानकारी मिलती है ,
बस इसका एकाग्रचित होकर विश्लेषण की जरूरत भर है
इस विषय पर मैं आपको बहुत सरल भाषा मैं समझाता हूँ
कुंडली का लग्न हमारे सम्पूर्ण स्वास्थ्य का प्रतिनिधित्व करता है ,
अतः हमें सर्वप्रथम लग्न का बारीकी से निरीक्षण करना चाहिए ।
यदि लग्नेश स्वयं बली है , किसी पाप प्रभाव में नहीं है , 6, 8 या 12 भाव में न हो , इन भावों के स्वामियों से युति या दृस्टि सम्बन्ध न हो , राहु , केतु , मंगल या शनि जैसे पापी ग्रहों से दृष्ट न हो तो सामान्यतः जातक का स्वास्थ्य अच्छा कहा जा सकता है ।
दोस्तों स्वास्थ्य विषयक विवेचन में लग्न के विवेचन के साथ अष्टम भाव का विवेचन अत्यंत आवश्यक है । कुंडली का अष्टम भाव 8 दीर्घायु से सम्बद्ध होता है । सामान्यतः अष्टम भाव में ग्रह का फल अच्छा नहीं होता , जैसे शनि अन्य भावों में भाव सम्बन्धी फल को रोकने
या मद्धिम करने वाकला होता है
परन्तु अष्टम भाव में शनि दीर्घायु देने वाला ग्रह है ।
कुंडली में स्वास्थ्य विषयक विवेचन में ,अच्छे स्वास्थ्य
के लिए अष्टम भाव का ठीक होना आवश्यक है ।
अभी तक जो बात हुई वो सामान्य स्वास्थ्य एवं उत्तम
आयु के लिहाज से थी , अब कुंडली के भावों पर आते हैं
जो शरीर के विभिन्न अंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं । इनके विवेचन के एक मात्र उदेश्य ये जानना है
की शरीर का कौन से अंग रोगग्रस्त है ,
या रोगग्रस्त होने की सम्भावना है ।
भाव और उनसे सम्बद्ध अंग निम्नलिखित हैं –
लग्न – सिर एवं सामान्य स्वास्थ्य
द्व्तीय भाव 2 – मुख , गर्दन
तृतीय भाव 3 – हाथ , कन्धा , भुजा
चतुर्थ भाव 4 – छाती , फेफड़े
पंचम भाव 5 – उदर , पाचन तंत्र
षष्टम भाव 6 – आंतें , अमाशय
सप्तम भाव 7- गुदा
अष्टम भाव 8 – दीर्घायु
नवम भाव 9 – Hips & Thighs
दशम भाव 10- घुटना ( knees )
एकादश भाव 11 – पिंडली ( lower legs )
द्वादश भाव 12 – पैर के पंजे ( feet )
दोस्तों जिस तरह कुंडली के बारह भाव शरीर के अलग अलग हिस्सों का प्रतिनिधित्व करते हैं
ठीक इसी तरह समस्त ग्रह किसी न किसी रोग का प्रतिनिधित्व करते हैं ।
कुंडली में रोग विषयक किसी भी फलकथन के लिए इनका जानना अत्यंत आवश्यक है ।
इनका व्योरा ये है –
सूर्य – अस्थि , रीढ़ और कुछ हद तक हृदय
चंद्र – ह्रदय , रक्त , मस्तिष्क , छाती और उदर
मंगल – पेशियाँ ( Muscles ) रक्त संचार ( circulation of blood )
बुध -त्वचा , वाणी , Nervous System
गुरु – लीवर , gall bladder , fat
शुक्र – मूत्र रोग , किडनी , हॉर्मोन्स
शनि – joint , knees , नसों के रोग , अवसाद
राहु – कैंसर , मतिभ्रम
कुंडली में रोग विवेचन में लग्न के बाद जो सबसे महत्वपूर्ण भाव है
वो है छठा भाव , कुंडली में छठे भाव को रोग भाव भी कहा जाता है
और षष्टेश को अर्थात छठे भाव के स्वामी को रोगेश कहते हैं ।
अब यदि हम किसी कुंडली का विवेचन जातक के स्वास्थ्य के विषय में करें तो ये देखना अत्यंत महत्वपूर्ण है की रोग भाव में कौन सा ग्रह स्थित है ,
यदि कोई ग्रह छठे भाव में स्थित है तो उस ग्रह से सम्बद्ध व्याधि होने की सम्भावना प्रबल होती है ।
कई बार छठे भाव में कोई ग्रह न होने की स्थिति भी होती है , इस स्थिति में हमें सबसे पहले ये देखना चाहिए
की रोगेश कौन से ग्रह है और रोगेश किस भाव में विराजमान है ।
उदाहरण के लिए यदि लग्न वृश्चिक हो तो रोगेश मंगल होगा ,
यदि ये दशम भाव में स्थित है तो जातक को घुटनों में व्याधि हो सकती है ,
क्यूंकि दशम भाव knee को रिप्रेजेंट करता है ,
चूकि मंगल का सम्बन्ध मसल्स से होता है
अतः knees में रोग के लिए मसल्स या ब्लड सर्कुलेशन एक कारण बन सकता है ।
रोगेश पर अन्य पापी ग्रहों का प्रभाव भी रोग बढ़ने में सहयोगी होता है ।